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अंबेडकरनगर जिलें में दवाओं को लेकर अब धीरे-धीरे शोर मचना शुरू हो चला है। दवाओं में विक्री मूल्य पर कमीशन दुकानदार धडल्लें से दे रहे है।

*धड़ल्ले से हो रही नकली दवाओं की बिक्री*
 
 
अंबेडकरनगर
 जिलें में दवाओं को लेकर अब धीरे-धीरे शोर मचना शुरू हो चला है। दवाओं में विक्री मूल्य पर कमीशन दुकानदार धडल्लें से दे रहे है। आखिर कपंनी के बिक्री मूल्यों से कम बिक्री होना आम आदमी के साथ खिलवाड़ होना आम बात है। कमीशन तो 10 से 40 फीसदी तक दुकानदार खुशी-खुशी से दे रहे है ।आखिर केंद्र और प्रदेश सरकार इन पर सिकंजा क्यों कस नही पा रही है जिलें मे नकली दवा के कारोबार पर अंकुश लगाया जाएगा। 
इन दवाओं के कंपनी और प्रिंट मूल्य की परख करने के बाद सरकारी आकड़ें अपने आप संदिग्ध लगते है। 

यही नही इन दवाओं पर लुभावने कमीशन भी धड़ल्ले से जारी है। कमीशन चिकित्साधिकारी ,सरकारी अस्पतालों , निजी क्लीनिक और नर्सिंगहोम से मेडिकल स्टोर तक सीधे तौर पर तालमेल चल रहा है। मेडिकल एंजेंसी चिकित्सकों के कमीशन उनकें रिहायसी मकानों पर अपने आप पहुचा देते है। नकली दवा अधिकांशतः सीरप , विटामिन ,प्रोटीन ,व इन्रर्जी की दवाओं पर है। स्थानीय  कंपनियों की कोई भी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट नहीं है। लेकिन उनके उत्पाद व ब्रांड बाजारों में धडल्लें से बिक रहे हैं है। इन मेडिकल स्टोरो पर क्या - क्या दवाएं बिकती है। 

इसकी जानकारी जिलें के मुख्यचिकित्साधिकारी कार्यालय और स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के चिकित्सा अधीक्षकों को भी नही है। इन मेडिकल स्टोरो की नियमित जांच की परंपरा तो नही है। जब छापामारी होती है तो जिलें भर कि मेेडिकल स्टोर के संचालन सटर डाउन करने में देरी नही लगाते। आखिर क्या ऐसी खासियत है जो जांच कराने से मेडिकल एंजेसी अपने आप को लुका-छिपा का खेल करने के लिए मजबूर है।
स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि इतना राजनैतिक प्रेशर है कि दवा खानों पर छापामारी होती है तो दुकानें बंद कर लोग छिप जाते है। फिर इनकी यूनियन एंजेंसी मामलें को लेकर अपने उत्पीड़न की बात कहकर प्रशासन पर दबाव डालती है। जिलें में इतने गंभीर रोगी है जिसके चलते मेडिकल स्टोरों की जांच अधर में रह जाती है।

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