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ग्रहणकाल में हर काम की क्‍यों होती है मनाही, जानिए इसका रहस्‍य


ग्रहण, नाम सुनते ही जेहन में एक अजीब सा खौफ कौंध जाता है। सबसे पहले जो बात दिमाग में आती है वो ये कि मंदिर के पट बंद हो जाएंगे। घरों से बाहर नहीं निकलेगे। बहुत सारी एहतियात बरतेंगे। घर के बड़े बुजुर्ग ग्रहणकाल के दौरान कई कामों को निषेध बताते हैं। इसके पीछे लोकोक्ति रहती है कि ग्रहणकाल के दौरान भगवान सूर्य या चंद्र देव कष्‍ट में होते हैं। जबकि इससे इतर ग्रहणकाल के दौरान कार्यों के निषेध होने का सनातन धर्म विज्ञान में विशेष आधार बताया गया है। इस बाबात जागरण डॉट कॉम ने धर्म विज्ञान शोध संस्‍थान, उज्‍जैन के निदेशक डॉ जे जोशी से जानकारी ली। डॉ जे जोशी ने अपने शोध के आधार पर बताया कि ग्रहण यानि बैक्‍टीरिया वायरस का पूर्ण प्रभाव। ग्रहण काल में हर कार्य निषेध होनेे का अर्थ है कि व्‍यक्ति पूरी तरह क्‍वारंटाइन हो जाए और अपने शरीर के अंगों सहित अन्‍य चीजों का स्पर्श भी न करे। इसके पीछे कारण है कि ग्रहणकाल में विषाणुओं का चरम स्‍तर पर सक्रिय होना। सीधी भाषा में कहें तो जो एहतियात कोरोना वायरस से बचने के लिए अपनाए जा रहे हैं बस उन्‍हीं उपायों को ग्रहणकाल में भी अपनाना चाहिए।


जून- जुलाई में हैं तीन ग्रहण

इस 2020 में कुछ समय के अंतराल में ही छह ग्रहण पड़ेंगे। एक ग्रहण 10 जनवरी को पड़ चुका है जबकि तीन जून- जुलाई में पड़ने वाले हैं। पांच जून को चंद्र ग्रहण, 21 जून को सूर्य ग्रहण और पांच जुलाई को चंद्र ग्रहण पड़ेगा।

ग्रहणकाल प्रभावित करता है पीढि़यों तक को

डॉ जे जोशी के अनुसार ग्रहणकाल में धरती के अंदर के तत्‍वाेें की ऊर्जा प्रभावित होती है। जिसके कारण इनसेक्‍ट और बै‍क्‍टीरिया वायरस तेजी से बढ़ते हैं। इनका दुष्‍प्रभाव भोजन, पानी के साथ इंसान के जींस तक पर पड़ता है। ग्रहणकाल के दौरान गर्भवती महिलाओं को बाहर न निकलने की और पेट पर गेरू लगाने की सलाह देने के पीछेे भी यही कारण होता है। भविष्‍य की पीढि़यों तक ग्रहण काल का प्रभाव देखा गया है। इस वक्‍त में मांसाहार या शराब का सेवन करने वाले बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं।

प्रकृति हो जाती है ग्रहणकाल में शांत

सनातन धर्म के शोध में देखा गया है कि संसार के हर पक्षी को पूर्वाभास होता है। ग्रहणकाल के प्रभाव को भांपते हुए इस वक्‍त में सारे क्षी पेड़ों पर शांत होकर बैठ जाते हैं। इससे पूर्व काक ध्वनि करता है। सभी पक्षी कलरव आरंभ करते हैं। ग्रहण के बाद नदी पर स्‍नान के लिए जरूर जाते हैं। श्‍वान जैसे चौपाये तक ग्रहणकाल में भोजन करने से बचते हैं। नदी की लहरेें धीमी हो जाती हैंं। मछलियों में विषाणु अधिक हो जातेे हैं। पीने का पानी, झूठे बर्तन, गन्दे वस्त्र सभी विषाणु के प्रभाव में आ जाते हैं। क्योंकि ये दुष्‍प्रभाव देरी से दिखता है इसलिए लोग ये बात समझ नहीं पाते।


*रिपोर्ट | भोवन सिंह रिपोर्टर आगरा*

( *NEWS 24 INDIA न्यूज चैनल*)

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