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आखिर कहीं तो कोई छन्नी लगानी पड़ेगी, जहां बच्चों में पैदा होती कुंठा को रोका जा सकेसोशल मीडिया और इंटरनेट से संचालित दूसरे मंचों को अुनशासित और जवाबदेह बनाने की मांग

आखिर कहीं तो कोई छन्नी लगानी पड़ेगी, जहां बच्चों में पैदा होती कुंठा को रोका जा सके
सोशल मीडिया और इंटरनेट से संचालित दूसरे मंचों को अुनशासित और जवाबदेह बनाने की मांग 

सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों से उत्तेजक और भ्रामक सूचनाओं के प्रसारण, फर्जी खबरों और झूठे संदेशों के चलते कई जगह हिंसक घटनाएं हो चुकी हैं। वहां अश्लील और आपराधिक घटनाओं से जुड़ी सामग्री की सहज उपलब्धता और उसके बेरोकटोक आदान-प्रदान की सुविधा होने के चलते बहुत सारे युवा और किशोरों में मानसिक विकृति लगातार बढ़ रही है! अब उनकी संवेदना इस कदर भोथरी हो चुकी है कि मामूली बातों पर हत्या, बलात्कार जैसी घटनाओं को अंजाम दे देना वे साहसिक कार्य समझते हैं। युवाओं में बढ़ती मानसिक विकृति को देखते हुए सोशल मीडिया और इंटरनेट से संचालित दूसरे मंचों को अुनशासित और जवाबदेह बनाने की मांग लंबे समय से होती रही है। मगर इस दिशा में सरकारों के लिए कोई व्यावहारिक कदम उठा पाना चुनौती भरा काम है।एक तर्क यह भी दिया जाता है कि साधनों का उपयोग कैसे करना है, यह व्यक्ति को खुद तय करना होता है। यानी सबसे पहले उपभोक्ता को खुद अनुशासित होना पड़ेगा। इस तर्क के आधार पर अंगुलियां माता-पिता और स्कूलों की तरफ भी उठती हैं। पर आज जब पढ़ाई-लिखाई से लेकर जीवन के तमाम क्षेत्र धीरे-धीरे सूचना तकनीक से जुड़ते गए हैं, बच्चों को मोबाइल फोन, कंप्यूटर आदि से दूर रखना और हर वक्त उन पर नजर रखना आसान नहीं है। ऐसे में अभिभावकों की सख्ती के साथ-साथ सोशल मीडिया आदि संचालित करने वाली कंपनियों की जिम्मेदारी से इनकार नहीं किया जा सकता कि वे ऐसी विकृतियां पनपने से रोकने के पुख्ता इंतजाम करें। आखिर कहीं तो कोई छन्नी लगानी पड़ेगी, जहां बच्चों में पैदा होती कुंठा को रोका जा सके।

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